उत्तराखंड क्रिकेट ट्रायल्स 2022

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यदि आप भी डिस्ट्रिक्ट लेवल क्रिकेट ट्रायल्स 2022 के बारे में जानना चाहते हैं तो आज हम आपके लिए लेकर आए हैं डोमेस्टिक क्रिकेट ट्रायल से कुछ चौंकाने वाली खबर। आमतौर पर डिस्टिक लेवल क्रिकेट में सिलेक्शन ट्रायल के बेस पर होता है और डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट ट्रायल प्रति वर्ष होते हैं किंतु इस वर्ष उत्तराखंड क्रिकेट में हरिद्वार डिस्ट्रिक्ट लेवल क्रिकेट सिलेक्शन प्रोसेस में बदलाव हुआ है आज इस क्रिकेट आर्टिकल के जरिए हम आपको इसी बदलाव के बारे में बताने जा रहे हैं अतः इस पोस्ट को अंत तक ध्यान से पढ़ें।

डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट में सिलेक्शन कैसे होता है

अभी तक हर राज्य में डिस्टिक लेवल क्रिकेट ट्रायल और स्टेट क्रिकेट ट्रायल होते आए हैं। हालांकि अभी भी जारी है किंतु उत्तराखंड में क्रिकेट ट्रायल की प्रक्रिया बदल गई है। पिछले वर्ष तक डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट ट्रायल्स मैं खिलाड़ियों का चयन एक निर्धारित ट्रायल की डेट पर जिले में क्रिकेट ट्रायल में इच्छुक युवाओं के द्वारा भागीदारी करके हुआ करता था। इस ट्रायल में सभी युवाओं को पार्टिसिपेट करने का मौका मिलता था फिर भले ही उन्होंने क्लब क्रिकेट खेला हो या ना हो वह ट्रायल का हिस्सा हो सकते थे। किंतु वर्ष 2022 से उत्तराखंड क्रिकेट बोर्ड के द्वारा नियमों में बदलाव करते हुए एक ऐसी प्रक्रिया लाई गई है जिसमें शायद काफी सारी प्रतिभाएं एकलव्य की भांति अपने असली मकाम तक पहुंचने में असफल हो जाएंगी।

डोमेस्टिक क्रिकेट ट्रायल 2022

batting practice tips

जिस प्रकार एकलव्य के पास गुरु ना होने के बावजूद भी अर्जुन से अधिक प्रतिभा थी किंतु गुरु द्रोण ने उनसे उनका अंगूठा गुरु दक्षिणा में मांग लिया और उनसे धनुष चलाने का अवसर ही छीन लिया। उसी प्रकार उत्तराखंड में टैलेंट की कोई कमी नहीं है और युवाओं के पास गुरु ना होने के बावजूद वे अकेले दम पर मैच का रुख बदलने का माद्दा रखते हैं किंतु जब उन्हें मौका ही नहीं मिलेगा तो वह भी एकलव्य की तरह लाचार हो जाएंगे। यहां एकलव्य की भूमिका में क्लब ना खेल पाने वाले युवा हैं और गुरु द्रोण की भूमिका में उत्तराखंड क्रिकेट एसोसिएशन है जिसने उन तमाम युवाओं से क्रिकेट ट्रायल का मौका ही छीन लिया जो वे बिना एकेडमी ज्वाइन किए भी दे सकते थे।

क्रिकेट ट्रायल में क्या होता है

 2022 में पहले की तरह क्रिकेट ट्रायल का अवसर अब शायद युवाओं को नहीं मिल पाएगा क्योंकि इस वर्ष से लीग क्रिकेट के तहत बच्चों का डिस्ट्रिक्ट के लिए सिलेक्शन हो रहा है। लीग क्रिकेट के तहत  कुछ टीमों  के आपस में मैच होंगे और उनमें से बेहतरीन प्रतिभाओं को डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट के लिए सिलेक्ट किया जाएगा गौरतलब है कि यह मैच अधिकतम क्लब की टीमों के द्वारा खेले जा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि उन प्रतिभाओं का क्या होगा जो किसी क्लब का हिस्सा नहीं है या फिर कोई क्लब ज्वाइन ही नहीं कर सकते हैं। क्या उनके लिए ट्रायल की भागीदारी का कोई विकल्प है? यदि ऐसे युवाओं को ट्रायल का मौका नहीं मिलेगा तो शायद यह उत्तराखंड क्रिकेट में टैलेंट की हार का काला अध्याय होगा।

क्रिकेट ट्रायल्स इन उत्तराखंड

क्रिकेट नियम बदलाव – जिस प्रकार बीसीसीआई ने उम्र से संबंधित एक बेहतरीन क्रिकेट रूल बनाया है जिसकी हर कोई तारीफ करता है, इस क्रिकेट नियम के अनुसार कोई भी खिलाड़ी क्रिकेट में हिस्सा ले सकता है उसके लिए कोई अधिकतम उम्र रखी ही नहीं गई है। इस नियम की बदौलत ही कई खिलाड़ी  35 से लेकर 45 और उससे अधिक उम्र तक क्रिकेट खेलते हुए नजर आए हैं। ताजा समय में दमदार ओपनिंग बल्लेबाज वसीम जाफर जो 44 वर्ष के हो चुके हैं और उन्हें डोमेस्टिक क्रिकेट का भीष्म पितामह भी कहा जाता है वे अभी तक रणजी ट्रॉफी में अपने बल्ले से जौहर दिखाते हैं। होना ऐसा ही चाहिए जब तक खिलाड़ी में टैलेंट है उसके शरीर में जान है तो उससे खेलने का अधिकार किसी को नहीं  छीनना चाहिए और प्रदर्शन के आधार पर ही उसे टीम के अंदर या बाहर किया जाना चाहिए ना की उम्र के आधार पर। एक तरफ बीसीसीआई क्रिकेट का यह बेहतरीन रूल है और दूसरी तरफ उत्तराखंड क्रिकेट एसोसिएशन ने टैलेंट को पूरी तरह से ध्वस्त करने वाला अजीबोगरीब बिना सर पैर का नियम बनाया जिसके तहत डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट सिलेक्शन, लीग क्रिकेट के आधार पर होगा। 

लीग क्रिकेट के आधार पर ट्रायल तब सही माना जाता जब लीग मैचेस मैं उन सभी युवाओं को भी मौका मिलता जो क्लब में नहीं खेलते हैं। यदि हर बार की तरह डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट ट्रायल्स करवाए जाते और उन ट्रायल्स में  सभी को बराबरी का मौका मिलना चाहिए चाहे वह क्लब खेलते हो या नहीं तथा  उन ट्रायल्स में सिलेक्शन होने पर उन सभी युवाओं की टीम बनाई जाती और फिर उनके आपस में लीग मैच करवाए जाते। उसके बाद बेहतरीन खिलाड़ियों का चयन डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट में किया जाता। ऐसा करने से एक बेहतरीन प्रतिस्पर्धा भी देखने को मिलती और किसी का हक भी नहीं मरता। उम्मीद करते हैं उत्तराखंड क्रिकेट  एसोसिएशन अपने इस फैसले पर पुनः विचार करेगा और उन एकलव्यो के बारे में भी सोचेगा जो क्लब क्रिकेट नहीं खेलते हैं या नहीं खेल सकते हैं। 


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